लखनऊ: उत्तर प्रदेश के शिक्षामित्रों की मूल समस्याओं का समाधान वर्षों से लंबित है, लेकिन इसके विपरीत उनके सामने नई चुनौतियाँ लगातार खड़ी होती जा रही हैं। बेहद कम मानदेय पर काम कर रहे शिक्षामित्र इस समय बीएलओ की ड्यूटी के कारण भारी मानसिक दबाव झेल रहे हैं।
शिक्षामित्रों, अनुदेशकों और अन्य संविदा कर्मचारियों को रोजाना फील्ड में जाकर कार्य करना पड़ रहा है, लेकिन इसके बावजूद उन्हें आवश्यक संसाधन उपलब्ध नहीं कराए गए हैं। कई शिक्षामित्रों के पास ऐसा स्मार्टफोन तक नहीं है जो इस ऑनलाइन कार्य को संभाल सके। फोन हैंग होने, समय सीमा कम होने, बार-बार फॉर्म बाँटने और कलेक्ट करने जैसे कार्यों ने दबाव और बढ़ा दिया है।
प्रदेश महामंत्री उमेश कुमार पांडेय के अनुसार, शिक्षामित्रों को लगातार लक्ष्य पूरा करने का दबाव दिया जा रहा है—एक दिन में 100 फॉर्म भरना, ऑनलाइन एंट्री करना और फिर फील्ड में जाकर सत्यापन करना। उन्होंने कहा कि निर्वाचन कार्य राष्ट्र का कार्य है और शिक्षामित्र इससे पीछे नहीं हटते, लेकिन बिना संसाधन दिए इतना बड़ा कार्य कराना कठिन हो जाता है।
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उमेश पांडेय ने बताया कि:
- शिक्षामित्र केवल ₹10,000 मानदेय में अश्लील इतने भारी कार्यभार को संभाल रहे हैं
- ऑपरेटर, लैपटॉप या कार्य-सहायक संसाधन उपलब्ध नहीं हैं
- फील्ड में अधिकारियों का कोई वास्तविक सहयोग नहीं मिल रहा
- राजनीतिक दलों और प्रशासन की ओर से दिनभर फोन और रिपोर्टिंग का दबाव
- महिलाओं शिक्षामित्रों को भी दूसरे जनपदों से लगातार कॉल आना, जिससे मानसिक तनाव और बढ़ता है
उन्होंने यह भी बताया कि बीएलओ ड्यूटी के दौरान कई दुखद घटनाएँ सामने आई हैं—किसी की ब्रेन हैमरेज से मौत हो गई, तो कोई तनाव में बीमार हो गया। भारी कार्यभार के कारण शिक्षामित्रों का मनोबल टूट रहा है।
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जहाँ तक मूल समस्याओं की बात है, पांडेय ने स्पष्ट किया कि वे आज भी जस की तस हैं। मानदेय वृद्धि, नियमितीकरण, समय पर भुगतान—इनमें से किसी पर भी ठोस प्रगति नहीं हुई है। कई जिलों में समर कैंप का भुगतान तक लंबित है, जबकि विभाग शिक्षामित्रों से हर कार्य समय पर करवाता है।
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अंत में उन्होंने चुनाव आयोग व सरकार से आग्रह किया कि:
- शिक्षामित्रों को संसाधन उपलब्ध कराए जाएँ
- कार्यभार के अनुपात में उचित मानदेय बढ़ाया जाए
- फील्ड में सहयोगी स्टाफ की व्यवस्था हो
- निरंतर बढ़ते दबाव को कम किया जाए
शिक्षामित्र लगातार कहते आ रहे हैं कि वे हर सरकारी कार्य में अग्रणी रहते हैं, लेकिन उनकी मूल समस्याओं पर ध्यान न दिया जाना उन्हें बेहद निराश कर रहा है। बढ़ते कार्यभार और कम मानदेय के बीच यह प्रश्न बड़ा हो गया है कि आखिर शिक्षामित्र कब तक संघर्ष करेंगे।
